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मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

मिथिला वर्णन गीत

मिथिला वर्णन गीत

साँझ पराती जतऽ सुन्दर तान, ओहि मिथिला के अछि हमर प्रणाम
जाहि ठाँ सल्हेस राज भेलैये, विद्यापति के गाम यौ
साँझ पराती.......

आमक गाछपर झुल्ला जाहि ठाँ, नेना भुटका झूलै छै
ठुमकि ठुमकि कऽ सिया बहिनियाँ, आंगने आंगने बूलै छै
जाहि ठाँ ललायित भेल छथि राम, ओहि मिथिला...................

उदयन धर्मक धुजा उठेने, सगरो लाज बचाबै छै
जाहि ठाँ विदुषी भारती सन के, बेटी-पुतौह बनि आबै छै
जाहि ठाँ के चाकर शिव भगवान, ओहि मिथिला के............

सब मिल* जतऽ गीत सुनाबय, छन्द अमितक भावै छै
विद्यापति केर अरजल मैथिली, किर्ति धुजा फहराबै छै
जाहि ठाँ छै अनुपम माँछ आ मखान, ओहि मिथिला के ...........

अमित मिश्र

*गायकक नाम देल जाएत
एकरा गयबाक लेल संपर्क करू ।बिना अनुमतिक एकर प्रकाशन वर्जित अछि ।

गजल

खाली हुनक बाते छलै फूल सन
बाँकी बचल सबटा छलै शूल सन

खंजर बनल नैनक कमल कोर छल
ठोरक त' लाली आगि जड़ मूल सन

बदलल किए सब आइ से  जानि नै
छल नेह काँटक पैघ टा कूल सन

छै आब सपना देखब व्यर्थ सन
भेलै कहाँ ओ हमर अनुकूल सन

जाएब हम पागल भ' कहलौँ सते
छै "अमित" सब किछु भेल निर्मूल सन

2212-2212-212

    अमित मिश्र

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

जुनि टेरू मुरली तान

गीत

हे कान्हा जुनि टेरू मुरली तान-2
सुनिते टेर मधुर वंशी के-2
धक धक धड़कय जान
हे कान्हा जुनि टेरू मुरली तान

1
फुटि गेल गगरी दूध उनटि गेल, चुनरी उड़ल कोन ठाम-2
नाचय पैर करय मन छटपट-2 पहुँचय धुन जँ कान
हे कान्हा जुनि टेरू मुरली तान

2
काज अपन सब छोड़ि क' हम सब, आबि गेलौं तोहे पास-2
लाजे निखरि गेल रूप हमर पुनि-2 रासक भेल ओरियान
हे कान्हा...    

3
बिनु देखने मम मोन लगय नहिं, भेटय ने किछु आराम-2
सखि गोपियन सब ठार कदम तर-2 देने अहीं पर ध्यान
हे कान्हा...........

4
हर
हैर लेलौं हरी सब के चितवन, भेलौं अहाँ चितचोर
हैर लेलौं हरी अन्नू के चितवन, भेलौं अहाँ चितचोर
अमित शरण गहि लेल हे नटवर-2 लियौ कनेक सज्ञान
हे कान्हा......

अमित मिश्र

विरह अगिनमाँ लागल हमरा

विरह अगिनमाँ लागल हमरा, हम त' रहलौं सुनगैत यै
क' क' छलनी हमर हियाकेँ चलि देलौं अहाँ मुस्कैत यै

1
कोना बाजल गेल अहाँकेँ बोली एहन कठोरगर यै
दिलसँ निकलय खून, द' देलौं घाव एहन त' भरिगर यै
हम मौलाएल फूल भ' गेलौं, अहाँ रहलौं खिलैत यै
क' क' छलनी हमर हिया..............

2
कतेक जतन सँ अहाँ केँ रखलौं मन मंदिरमे बैसा कए
प्रेम हमर नै देखल अहाँ, देखलौं केवल पैसा कए
अहाँ मातल मधुर हँसीमे, हम त' रहलौं सुनगैत यै
क' क' छलनी हमर हिया.........

3
आब करब विश्वास ने कहियो, द' गेलौं यै सीख एहन
जकरा भीतर स्वर्थ भरल हो, ओकरा लेल फेर शोक केहल
हम त' रहलौं याचक बनि क',अहाँ रहलौं मोलबैत यै
क' क' छलनी.........

सोमवार, 9 अप्रैल 2018

पुरना चाउर

3.17 पुरना चाउर

आइ जखनसँ मकान मालिक रेन्ट बढ़बैक बात केलकै तखनेसँ सुलेखाक माँथ दर्द क' रहल छलै ।एकटा मध्यम वर्गीय परिवार लेल शहरमे रहब कोनो हल्लुक बात त' नहियें छै ।2017 मे जखन घरपर भैयारीसँ झगड़ा क' शहर आएल छलै तखन रेन्ट मात्र पाँच हजार लागै छलै ।सुलेखाक पति सेहो प्राइवेटोमे 20-25 हजार कमा लैत छलै ।जिनगी मजामे कटै छलै ।दिनानुदिन बाल-बच्चा बढ़ैत गेलै आ तकरे संग बढ़ैत गेलै महगाइ, घरक खर्चा आ मकानक रेन्ट ।मुदा एकर वनिस्पत आमदनी नै बढ़लै ।प्राइवेटक काज त' फिक्स रेटपर होइते छै।मुदा खर्चा ...फिक्स थोड़े छलै।बोझ बढ़िते जा रहल छलै । स्थिति ई छै जे एखन जनवरी 2045 मे मकान बला सुना गेलै जे आब रेन्ट पचास हजार लागतै ।ई सुनितहिं सुलेखाक मोन भरिया गेल छलै ।की करी, की नै करी ?किछु फुराइत नै छलै ।खूब सोचि-बिचारि क' सुलेखा गामपर फोन लगेलक "दीदी, की करियै ?आब शहरमे रहनाइ आ एकर बोझ उठेनाइ  पहाड़ जकाँ लागि रहल छै ?"
बड़की दियादनी सभ बात बुझि गेलै ।साहस दैत कहलकै,"चिन्ता नै करू कनियाँ, सब किछु बेच देलाक बादो घरारी त' बचल अछि ।पुरना बात सभ बिसरि क' आबि जाउ ।सब दिनसँ पुरने चाउरक पथ पड़ै छै ।घरारी अहाँक बाट जोहि रहल अछि ।"
सुलेखाक आँखि नोरा गेलै ।फोन काटलक आ पैकिंगमे लागि गेल ।

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

दया

अझुका रचना- लघुकथा
3.16 दया

"जय जय सीताराम ।भगवान भला करताह ...यौ घरबारी बाबाकेँ किछु दियौ ।"साधु बाबाक स्वर सुनि मोहन घरसँ बहर एलै ।
"बाबा कत'सँ आबि रहल छी ।"मोहनक प्रश्न सुनि बाबा कने सोचमे पड़ि गेलाह ।एकटा नम्हर साँस छोड़ि कहलनि
"साधुक कोनो घरबार त' होइ नै छै ।कोन ठामक नाम कहब ।बस एते बुझू जे घुमन्तू छी ।"
"तैयो कतौ त' अहाँक अपन गाम हेतै !"
"हँ छलै, मुदा आब नै छै ।सब किछु खत्म भ' गेल ।"बाबाक मोन कने दुखित जकाँ भ' गेलै ।
"ओह !लागैए हम अनावश्यक गप शुरू क' देलौं ।ई कहु जे अहाँक की सेवा कएल जाए ।"
"किछु टाका-ताका द' दिअ ।पापी पेट जे ने कराबय ।"
"एकटा काज करू बाबा ...अहाँ हाथ-मुँह धो क' आउ भोजने क' लेल जाए कमसँ कम एक सप्ताह हमर आतिथ्य स्वीकार करू ।एहन कमजोर देह ल' कत' रौदमे बोआएब ?"
"जय सीताराम, भगवान अहाँकेँ औरदा दैथि बौआ ।अहाँ बड पैघ आदमी बनब ।अहाँकेँ धन-धान्यक अभाव नै रहत ।"
"से कोना कहि सकै छी ।ओ सब त' भगवानक हाथमे छै ।"
"हम अहाँक आतिथ्य देख कहि सकै छी जे अहाँक हृदय बड पैघ अछि ।अहाँकेँ बुढ़-बुजुर्गपर बड दया आबैत अछि ।जँ एकर दशांशो दया हमर बेटा सभकेँ रहितै त' आइ हम अहाँ ओहिठाम नै, अपन गाममे रहितौन ।" बाबाक आँखिसँ नोरक दू टा बुन्न बलुआह माँटिकेँ सिक्त क' देलकै ।